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Showing posts from April, 2016

मवेशियों के बीच नौनिहाल

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एक तरफ तो लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी स्वच्छ भारत अभियान की शुरूआत करते हैं, बच्चों के उज्ज्वल भविष्य का सपना देखते हैं, देश के लोगों से बच्चों की शिक्षा की भीख माँगते हैं और दूसरी तरफ उनके इन तमाम इरादों और स्वर्णिम भारत के सपने का माखौल भाजपा शासित राज्यों में ही उड़ाया जा रहा है. मध्य प्रदेश में शिक्षा के इतने बदतर हालात हैं कि मवेशियों के बीच मासूम बच्चों को भोजन करना पड़ रहा है. मध्य प्रदेश के रीवा जिले  से आई इन तस्वीरों को देखकर तो कम से कम हम यही कहेंगे. देश के नौनिहालों के जर्जर भविष्य को दर्शाती ये वो स्याह तस्वीरें हैं जो आमतौर पर अनेक राज्यों में देखी जा सकती हैं.      इन तस्वीरों को देखकर आसानी से यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि उन चिरागों के हालात क्या हैं जिनसे जहाँ को रौशन करने के हम सपने देखते हैं.     अगर इन तस्वीरों की व्यापकता पर प्रकाश डाला जाए तो ऐसी तस्वीरें सिर्फ मध्यप्रदेश में ही नहीं अपितु देश के अनेक राज्यों में दिख जाएँगी.  रीवा जिले के ही ककरहा ग्राम पंचायत की शासकीय...

राष्ट्रवाद पर मीडिया की अंतर्कलह

यूँ तो राष्ट्रवाद पर बहस काफी लंबे समय से चल रही है, और समय समय पर इसकी नई परिभाषाएँ भी सामने आती रही हैं। उदाहरण के तौर पर कहें तो राष्ट्र भक्ति के क्या पैमाने हैं, सच्ची राष्ट्रसेवा क्या है, जैसे तमाम सवाल खड़े होते रहे हैं। इन जटिल मुद्दों पर तमाम परिभाषाएँ भी समय समय पर सामने आती रही हैं। इनमें से कुछ को लोगों ने अपनाया तो कुछ पर किसी का ध्यान भी नही गया। इन परिभाषाओं के जन्मदाताओं में कुछ खास हैं तो कुछ सामान्य जनजीवन वाले आदमी हैं। कुछ वामपंथी हैं तो कुछ कथित राष्ट्रवादी भी हैं जो प्रखर राष्ट्रवाद की वकालत करते हैं। ये अलग बात है कि वो खुद कहाँ तक राष्ट्रहित में स्वयं को समर्पित कर पाते हैं। खासतौर पर ये बात हम उन तथाकथित राष्ट्रवादियों के लिए ही कह रहे हैं क्योंकि राष्ट्रभक्ति के नाम पर ज्यादा शोर शराबा भी वही करते हैं। हमारे देश में भावनाओं का बड़ा अहम स्थान है इसीलिए कई बार सस्ती लोकप्रियता के लिए लोग राष्ट्रवाद का चोला ओढ़कर राष्ट्रभक्ति का ढोल बजाते देखे जा सकते हैं। जाहिर तौर पर सबकी अपनी अपनी राय है, अपने अपने विचार हैं, और होने भी चाहिए। मुद्दे की जटिलता ही ऐसी है क...