धार्मिक भावनाओं की ज़मीन पर उत्तर प्रदेश की सियासत

आए दिन धर्म संप्रदाय की कुत्सित राजनीति से चर्चा में बने रहने वाला  उत्तर प्रदेश  पिछले कुछ दिनों से एक बार फिर देश  की राजनीति के  केंद्र में है. वजह है शामली जिले के कैराना  से  कथित तौर पर हिन्दू परिवारों  का पलायन. भाजपा सांसद  हुकुम सिंह ने  बाकायदा तमाम दस्तावेजों के  साथ उपस्थित होकर  प्रेस कांफ्रेंस  कर राज्य की सत्ताशीन सपा सरकार पर हर मोर्चे पर  विफल होने का आरोप लगते हुए हिन्दू परिवारों के पलायन की बात कही. बीजेपी सांसद ने 346 परिवारों की सूची जारी करते हुए उनके विस्थापन  की बात कही . हालाँकि बाद में शासन ने अपने स्तर पर मामले की  जाँच की, और  पाया कि 346 में से 188 परिवार पांच वर्ष और 66 परिवार दस वर्ष  पहले ही इस जगह को छोड़कर जा चुके हैं. इस मुद्दे को  तत्काल लपकते हुए  भाजपा के हिन्दुओं की सुरक्षा के ठेकेदार संगीत सोम जैसे नेता फिर से सक्रिय हो गए और अपने 2000 समर्थकों के साथ निर्भय यात्रा निकाल दी. हालाँकि यात्रा ज्यादा लम्बी नहीं चल सकी.
इसके बाद से अब तक भाजपा के तमाम नेता समय समय पर अपने उबलते हुए बयानों से इस मुद्दे को हवा दे रहे हैं.  सभी बयानों में स्वयं को हिंदुत्व के सजग पैरोकार के रूप  में प्रस्तुत कर रहे हैं.  
ध्यान रहे कि भाजपा नेताओं द्वारा हिन्दू परिवारों  के विस्थापन का यह मुद्दा ऐसे समय पर उठाया जा रहा है जब सरकार अपने कार्यकाल के आखिरी चरण में हैं. ऐसे में इस बात की भी आशंका व्यक्त की जा रही है कि भाजपा आगामी विधानसभा चुनावों के मद्देनज़र ऐसे मुद्दों को हवा दे रही है. दरअसल भाजपा का पुराना इतिहास ही इन आशंकाओं के पीछे की बड़ी वजह है. वो इतिहास जिसमे भाजपा के दो से दो सौ इक्यासी  तक का सफ़र तय करने की पूरी कहानी दर्ज है. जिसमें  राम मंदिर की अहम भूमिका रही है. हालाँकि समय के साथ भाजपा नेताओं को इस बात का भान हो गया कि सिर्फ इन्हीं मुद्दों पर सवार होकर चुनावी वैतरणी पार नहीं की जा सकती. यही वजह है कि अब भाजपा नेताओं के चुनावी  भाषणों में विकास के मुद्दे अहम होते हैं. 
अगर हम जाति  धर्म की राजनीति  की व्यापक पड़ताल करें तो पायेंगे कि यहाँ नेताओं द्वारा समय समय पर इन्ही मुद्दों की आग में सियासी रोटियां  सेकी जाती रही हैं. अभी तो शुरुआत है देखते हैं इस बार उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनावों में भाजपा तथा अन्य दल  और कितने सांप्रदायिक मुद्दों को अपना  चुनावी हथियार बनाते हैं..? धार्मिक भावनाओं की जमीन पर अभी और कितनी सियासी फसल उगाई जायेगी..?
         
आप सकारात्मक बने रहिए, उम्मीद मत छोड़िए।          

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