'शाह' क़ाबिल या सिर्फ़ मोहरा
भारत गाँवों का देश कहा जाता है और इन्हीं गाँवों में अब से कुछ
समय पहले तक एक कहावत प्रचलित थी- 'भारत माँ की तीन धरोहर, अटल
आडवाणी मुरली मनोहर', यह देखने में आया है कि पिछले एक दशक
में यह कहावत धीरे-धीरे लोगों की जुबान से उतर सी गई है, क्योंकि
इसके किरदार गुमनाम हो गये।
हम बात कर रहे हैं ‘भारतीय जनता पार्टी’ की जिसके
रीढ़ यही त्रिमूर्ति थे। अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण
आडवाणी और डॉ मुरली मनोहर जोशी। यही तीन थे जिनकी छत्रछाया में पार्टी और
कार्यकर्ता चल रहे थे। वरिष्ठ स्तंभकार प्रदीप सिंह कहते हैं- ‘मनुज बली नहि होत है समय होत बलवान’, अगर वाजपेयी जी
को छोड़ दें तो ये दोनों भी समय के शिकार हुएऔर धीरे-धीरे राजनैतिक नेपथ्य में चले
गये या कहें कि धकेल दिये गये। सत्ता परिवर्तन के साथ ही इनकी भूमिका बदली और इन
दोनों बुजुर्ग नेताओं को मार्गदर्शक मंडल में डाल दिया गया, जिनसे
पार्टी को कोई मार्गदर्शन नहीं लेना है।
अगर मीडिया की भाषा में बात करें तो अब मुख्यधारा में इन तीनों के
स्थान पर नरेंन्द्र मोदी, राजनाथ
सिंह और अमित शाह आ गये हैं।
हाल ही में अमित शाह को दोबारा भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया
गया है। ज्ञात हो कि अमित शाह की इस बार की ताजपोशी से मार्गदर्शक मंडल के दोनों
वरिष्ठ नेता नदारद रहे, या
कहें कि कोई भूमिका नहीं रही। बात अगर अमित शाह के पहले निर्वाचन की करें तो तब निर्वाचन
कम मनोनयन ज़्यादा हुआ था। तब दो प्रमुख वजहें थी, पहली थी
अमित शाह के यूपी प्रभारी रहते यूपी में अप्रत्याशित जीत और दूसरी सबसे बड़ी वजह
थी अमित शाह पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरपरस्ती।
यूँ तो
उत्तरप्रदेश में मिली लोकसभा चुनावों की सफलता का श्रेय सीधे तौर पर अमित शाह को
दिया जाता है, परंतु जितना योगदान अमित शाह के रणनीतिक कौशल का था उससे कहीं ज़्यादा
मोदी लहर का प्रभाव था। उस वक्त भी पार्टी के तमाम बड़े नेताओं को अमित शाह का नाम अध्यक्ष
के तौर पर स्वीकार नहीं था, क्योंकि अमित शाह को अध्यक्ष बनवाने में नरेन्द्र मोदी
की अहम भूमिका थी, इसलिये अमित शाह के अध्यक्ष बनने के खिलाफ किसी ने आवाज़ नहीं
उठाई।
खैर तब की स्थिति कुछ और थी और अब की स्थितियाँ
एकदम भिन्न हैं। तब मोदी लहर चरम पर थी शायद इसीलिये 2014 में तमाम राज्यों मे हुए
विधानसभा चुनावों में भी पार्टी को अपेक्षित सफलता मिली। अब मोदी लहर का असर
समाप्त हो चुका है, दिल्ली और बिहार मे हुएविधानसभा चुनावों
में पार्टी को करारी हार का सामना करना पड़ा। अपने आगामी कार्यकाल में अमित शाह को
उत्तर प्रदेश समेत कई बड़े राज्यों में चुनावों का सामना करना है। उम्मीद है अमित
शाह खुद को अध्यक्ष के तौर पर पहले से बेहतर साबित कर पायेंगे।
वैसे आप सकारात्मक बनें रहिए, उम्मीद मत छोड़िए!
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