असमानता एक अभिशाप

15 फरवरी को  मैने अखबारों में एक खबर पढ़ी थी। खबर उन दो  जवानों के संदर्भ में थी जो कश्मीर के कुपवाड़ा में आतंकियों से लड़ते हुये शहीद हो गये। अगले दिन किसी भी समाचार पत्र में उनके बारे में कोई खबर देखने को नही मिली। ऐसा नही है कि देश उन शहीदों के बारे में जानना नही चाहता। देशवासी उनके बारे में भी कुछ जानने के लिये उतने ही इच्छुक हैं  जितना हप्ते भर पहले हनुमनथप्पा के बारे मे जानना चाहते थे। हनुमनथप्पा के बारे में ज्यादा बताने की आवश्यकता नही है क्योंकि आप सभी उनके बारे में जानते हैं। जानेंगे क्यों नही, देश की मीडिया के केंन्द्र मे जो थे। पर वहीं सियाचिन में ही उनके साथ ही देश के आठ और जवान शहीद हुये थे, क्या आप उनके बारे मे भी जानते हैं.? उन शहीदों का नाम, पता आदि। अगर नही जानते तो इसमें आपका कोई दोष नही है क्योंकि आपको उनके बारे मे मीडिया द्वारा पर्याप्त जानकारी नही दी गई। हकीकत यही है कि मीडिया द्वारा  उन आठ शहीदों को उतना महत्व नही दिया गया जितना हनुमनथप्पा को दिया गया। सायद मीडिया ने इसलिये ज्यादा तरजीह दी क्योंकि वो हनुमनथप्पा थे, नही... तो फिर इसलिये क्योंकि वो 35 फिट नीचे दबे हुये थे, या फिर हनुमनथप्पा छह दिन तक मौत से संघर्ष करने के बाद हारे और ये आठ मौत का इतना लंबा मुकाबला नही कर सके। वजह जो कुछ भी हो परंतु मीडिया को यह नही भूलना चाहिये कि शहादत उनकी भी हुई है। जहाँ हनुमनथप्पा को देश के प्रधानमंत्री की सहानुभूति मिलती है वहीं उन आठों को पीएम की संवेदना भी नसीब नही होती। 
इतनी असमानता क्यों....? 
खैर यह तो हो गई मीडिया की बात, जहाँ पर मुद्दे अपनी सहूलियत के हिसाब से तय किये जाते हैं।

हमारे देश में असमानता का क्षेत्र व्यापक है। असमानता देश की रगों में व्याप्त है। अनेकता में एकता हमारे देश की पहचान है, परंतु देश का दुर्भाग्य यह है कि असमानता इसकी जड़ मे व्याप्त है।
हमारे देश में गरीब और गरीब, अमीर और भी अमीर होता जा रहा है।
यह वो देश हे जहाँ एकतरफ किसान कर्ज लेकर ना चुका पाने की स्थिति में आत्महत्या करने को विवश होता है वहीं अंबानी , मित्तल सरीखे दिग्गज अमीरों की फेहरिस्त में लगातार उछाल मार रहे होते हैं।
यह वो देश है जहाँ एकतरफ तो ऊँची-ऊची गगनचुंबी  रईसों की इमारतें हैं वहीं उनसे सटी हुई उन गरीबों की मलिन बस्तियाँ भी हैं जो दो जून की रोटी के लिये जद्दोजहद कर रहे होते हैं।
यह वो देश है जहाँ अमीरों की शताब्दी, राजधानी जैसी ट्रेनों को सिग्नल देने के चक्कर में आम आदमी की ट्रेनों को एक स्थान पर ही घंटों रोककर रखा जाता है।
यह वो देश है जिसका समूचा तंत्र उस अंग्रेजी के रंग में तो रंग गया जो अंग्रेज छोड़कर गये थे, परंतु देशवासियों की प्रियभाषा हिन्दी को आजतक राष्ट्रभाषा का दर्जा नही मिल पाया।
सवाल वही है कि इतनी असमानता क्यों........?
सकारात्मक बने रहिये, उम्मीद मत छोड़िये।


Comments

Popular posts from this blog

संवेदना बड़ी या संविधान.......?

राष्ट्रवाद पर मीडिया की अंतर्कलह

धार्मिक भावनाओं की ज़मीन पर उत्तर प्रदेश की सियासत