पत्रकारिता- एक परिचय

पेशे और पैसे में ना सिर्फ शाब्दिक बल्कि व्यावहारिक दृष्टि से भी बड़ा ही सूक्ष्म अंतर होता है। आमतौर पर हर पेशेवर की यही चाहत और उम्मीद होती है कि वह जिस भी पेशे में जा रहा है उसमें उसे भरपूर पैसे मिलें, भरपूर कहना ठीक नहीं होगा क्योंकि भरपूर तो शायद तब होता है जब संतोष का भाव आ जाता है, और पैसों को लेकर संतोष का भाव आ जाए, ऐसा संभव ही नहीं है। इसीलिए भरपूर ना भी मिलें तो कम से कम इतनी आय तो जरूर हो जिससे कि पेशेवर का जीवन सुचारू रूप से चल सके। वह अपनी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ ही सामान्य जीवन जी सके।

यह सच है कि एक आम पेशेवर इतना कमा भी लेता है और अपनी इच्छाओं के घोड़े को काबू में रखकर सामान्य जीवन भी जी लेता है, परंतु पत्रकारिता के साथ ऐसा नहीं है। यह एक ऐसा पेशा रहा है जिसके साथ पैसे का कोई मेल नहीं है। शायद इसलिए क्योंकि इसके साथ सेवा का भाव जुड़ गया है, जनसरोकार जुड़ा हुआ है। एक पत्रकार अपने पेशे के जरिए देश और समाज की बुराइयों और कुरीतियों को उजागर करता है। जाहिर है यही वो वजहें हैं जो इसे आम पेशे से अलग करती हैं।

ऐसा इसलिए क्योंकि पत्रकारिता की शुरुआत ही मिशन को लेकर हुई। माखनलाल चतुर्वेदी, गणेशशंकर विद्यार्थी जैसे क्रांतिकारी पत्रकारों ने इसे पेशा नहीं बल्कि राष्ट्रसेवा के रूप में अपनाया और देश की रगों में  वैचारिक क्रांति की आग प्रज्वलित की। हालांकि वक्त गुजरने के साथ कहीं न कहीं इसके स्वरूप में परिवर्तन आया, और स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात अखबार निकालना एक व्यवसाय के रूप में देखा जाने लगा। ऐसा भी नहीं है कि समय बीतने के साथ ही इससे जनसरोकार और सेवाभाव का लोप हुआ, जनहित तब भी था और अब भी है। और जहाँ जनहित हो, जिस पेशे के साथ जनसरोकार जुड़ा हो, निश्चित ही वह आम पेशे से भिन्न हो जाएगा।

इस तरह पत्रकारिता एक ऐसा पेशा है जो सेवा भाव के बिना संभव ही नहीं है, और जहाँ सेवाभाव हो वहाँ चुनौतियाँ रहती ही हैं। आए दिन देश की सुरक्षा में लगे जवानों की शहादत इसकी नजीर है।

इसी तरह पत्रकारिता में भी तमाम चुनौतियाँ हैं। कहा जाता है कि एक पत्रकार कभी अपनी ड्यूटी से मुक्त नहीं होता। उसे हर वक्त चौकन्ना रहना होता है, ताकि कभी भी कहीं भी कोई आकस्मिक घटना घटे तो वह उससे अवगत हो सके। एक पत्रकार के लिए खबर की बड़ी अहमियत होती है, खबर ही उसका आहार होता है। कभी कभी मीडिया के विभिन्न माध्यमों के पत्रकारों की तैनाती नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में हो जाती है, जहाँ हर वक्त उन्हें आतंक के साए में जीने को विवश होना पड़ता है। दूसरे शब्दों में कहें तो उनकी कर्मभूमि वह हो जाती है जहाँ आए दिन मौत का तांडव देखने को मिलता है। इन सबके बावजूद कई बार ऐसा होता होता है जब एक पत्रकार सच्ची पत्रकारिता करते हुए बड़ी खबरों को निकालता है, बड़े भ्रष्टाचार की खबरों को उजागर करता है, और उन खबरों को मालिकों और संपादकों के द्वारा दबा दिया जाता है। एक सच्चे पत्रकार के लिए ऐसी स्थितियाँ बेहद ही हताश और निराश करनें वाली होती हैं, जो मानसिक तौर पर पत्रकार को तोड़ कर रख देती हैं। कई बार पत्रकारों को सीमा पर जाकर उन जगहों से  आतंकी गतिविधियों की रिपोर्टिंग करनी होती है जो बेहद खतरनाक होती हैं। वो जगह राजस्थान के तपते मरूस्थल या फिर सियाचिन कहीं भी हो सकती है जहाँ की ठंड हाड़ कंपाने वाली होती है। पूर्व में तो कुछ पत्रकारों द्वारा युद्धों के दौरान सीमा पर जाकर पत्रकारिता की गई है जो भारतीय पत्रकारिता जगत में कीर्तिमान के रूप में मौजूद है। इस तरह ये तमाम चुनौतियाँ हैं जिनसे एक पूर्णकालिक पत्रकार का सामना होता है।

अगर संभावनाओं की बात करें तो पत्रकारिता एक सम्मानजनक पेशा है जहाँ एक पत्रकार को औसत आमदनी के साथ ही लोगों का प्यार और आदर मिलता है। एक पत्रकार की उसके पत्रकारीय जीवन में समाज के हर तबके से मुलाकात होती है, जिसमें गाँव के गरीब मजदूर से लेकर कलेक्टर तक शामिल होते हैं। अब क्योंकि एक पत्रकार सूचना का संवाहक होता है, जनता और सरकार के बीच मध्यस्थ की भूमिका में होता है, इसलिए स्वाभाविक ही आम जन में उसकी पैठ होती है। एक पत्रकार अपनी लेखनी से समाज की दशा और दिशा का निर्धारँण करता है। वर्तमान में मीडिया की व्यापकता दिनोदिन बढ़ रही है। पत्र, पत्रिकाओं और समाचार चैनलों की भरमार है इसलिए इस क्षेत्र में संभावनाएँ भी बढ़ गई हैं।                    


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